A good poem on Independence
यह न समझो देश को स्वाधीनता यों ही मिली हें |
हर कली इस बाग की कुछ खून पी कर ही खिली हैं ||
बिछ गये वो नीव में दीवार के नीचे गढ़े हैं |
महल अपने शहीदों की छातियों पर खड़े हैं ||
नीव के पत्थर तुम्हे सौगंध अपनी दे रहे|
जो धरोहर दी तुम्हे हाथ से जाने न देना ||
राष्ट्रा के शृंगार मेरे देश के साकार सपनों|
देश की स्वाधीनता पर आँच तुम आने न देना||


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